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नज़्म

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HomeSpiritualityनज़्म

कितनी ही रस्मो दुहाई दी तुझे मैंने
पर बेरुखी का रुख तूने अपनाया हुआ हैं
बंद करके देख ली आँखें तेरे शौकत की नज़्म पे
तू फना हो गया या इठलाया हुआ हैं
तेरे जलसे का नशी मैं तेरा रहमो करम
तू ही तू हैं फिर पर्दा क्यूं लगाया हुआ हैं
तुझे पाने की जुस्तजू में मैं मिटता रहूं 
तेरे कदमों की आहट को लगाकर सीने से
मैं बैठा रहा तू आया नही
मैने सजदे किये तू समाया नहीं
ये तेरी हैं शरारत या हैं और कोई दास्तां
तू बताता नहीं तू समझाता नहीं
तू दर्द ए मरहम भी लगाता नहीं
तू आया नहीं तू आया नहीं

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