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मेरी कश्ती खो गई

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एक छोर से दूर हो जाता, जब होता इस छोर के पास
फिर खे ले जाता कोई मन की नैया ना रह पाता इस छोर के साथ
तूफानी सागर के भंवर में एक दिन कयामत हो गई
मानो बिजली कौंध गयी मेरी कश्ती खो गईं
जब देखा अनंत सागर को पहेली बूझ हो गई
मैं क्यूं उलझू छोरो में ये उलझन दूर हो गई

बूँद सागर में खो गई
नापने समुद्र की गहराई मैं गोता अब जब जब लगाता हूँ
कुछ मोती चुग लाता हूँ कुछ लहरों संग थिरक आता हूँ
सिप्पीयो से बात करने की हसरत मेरी पूरी हो गई
मेरी कश्ती खो गईं मानो बिजली कौंध गयी

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